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नोएडा और ग्रेटर नोएडा के स्कूलों में स्मार्ट टीवी का स्क्रीन टाइम घटाया गया, छात्रों की पढ़ाई पर असर की समीक्षा

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Yojna Portal
Author
October 6, 2026
Published
10 min
Read Time
Kanshiram Nagar
Location
Summary: नोएडा और ग्रेटर नोएडा के स्कूलों में स्मार्ट टीवी और डिजिटल स्क्रीन का इस्तेमाल सीमित किया गया है। प्राथमिक के लिए 30 और अपर-प्राइमरी के लिए 60 मिनट की सीमा तय हुई है।
नोएडा-ग्रेटर नोएडा | शिक्षा अपडेट

नोएडा और ग्रेटर नोएडा के स्कूलों में स्मार्ट टीवी का स्क्रीन टाइम घटाया गया, छात्रों की पढ़ाई पर असर की समीक्षा

नोएडा और ग्रेटर नोएडा के स्कूलों में स्मार्ट टीवी, स्मार्ट बोर्ड और डिजिटल स्क्रीन के इस्तेमाल को लेकर नई व्यवस्था लागू की गई है। गौतम बुद्ध नगर जिला प्रशासन ने छात्रों के दैनिक स्क्रीन टाइम को सीमित करने के निर्देश दिए हैं। इसका उद्देश्य बच्चों को लगातार स्क्रीन के सामने बैठाने के बजाय किताब, लिखने, शिक्षक से सीधे संवाद, खेल और अन्य गतिविधियों के लिए पर्याप्त समय देना है।

प्राथमिक छात्रों के लिए 30 मिनट स्क्रीन टाइम

गौतम बुद्ध नगर प्रशासन के निर्देशों के अनुसार प्राथमिक कक्षाओं के छात्रों के लिए स्कूल में डिजिटल स्क्रीन का दैनिक इस्तेमाल अधिकतम 30 मिनट तक सीमित किया गया है। अपर-प्राइमरी कक्षाओं के लिए यह सीमा 60 मिनट प्रतिदिन रखी गई है।

यह निर्देश नोएडा और ग्रेटर नोएडा के सरकारी, सहायता प्राप्त और निजी स्कूलों पर लागू किए गए हैं। प्रशासन का उद्देश्य स्मार्ट क्लास या डिजिटल शिक्षा को पूरी तरह खत्म करना नहीं है, बल्कि स्क्रीन का इस्तेमाल केवल जरूरत के अनुसार और संतुलित तरीके से करने पर जोर देना है।

स्कूलों को कठिन विषयों को समझाने, जरूरी चित्र, वीडियो या अन्य डिजिटल शिक्षण सामग्री दिखाने के लिए स्मार्ट स्क्रीन का इस्तेमाल करने की अनुमति है। हालांकि लगातार किताब की सामग्री स्क्रीन पर दिखाने या हर गतिविधि के लिए डिजिटल बोर्ड पर निर्भर रहने से बचने के निर्देश दिए गए हैं।

4 से 5 घंटे स्क्रीन इस्तेमाल की शिकायतों के बाद फैसला

प्रशासन के सामने कुछ अभिभावकों ने शिकायतें रखी थीं कि कई स्कूलों में बच्चों का स्मार्ट बोर्ड और डिजिटल स्क्रीन के साथ समय जरूरत से काफी अधिक बढ़ गया था। कुछ मामलों में छात्रों के स्कूल समय में 4 से 5 घंटे तक स्क्रीन देखने की शिकायत सामने आई। इसके बाद प्रशासन ने स्कूलों में स्क्रीन के इस्तेमाल को नियंत्रित करने के लिए दिशा-निर्देश जारी किए।

स्मार्ट टीवी बंद होने के बाद कक्षा में क्या बदला?

स्क्रीन टाइम कम होने के बाद कई स्कूलों में शिक्षकों को पारंपरिक शिक्षण तरीकों की ओर वापस जाना पड़ा है। व्हाइटबोर्ड, ब्लैकबोर्ड और मार्कर का इस्तेमाल बढ़ा है। बच्चों को किताब से पढ़ने, कॉपी में लिखने और शिक्षक के साथ सीधे सवाल-जवाब करने के लिए अधिक समय दिया जा रहा है।

कुछ स्कूलों में स्मार्ट स्क्रीन का इस्तेमाल सप्ताह में केवल चुनिंदा दिनों या विशेष विषयों के लिए किया जा रहा है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि डिजिटल तकनीक शिक्षक की भूमिका का विकल्प न बने बल्कि पढ़ाई को समझने में सहायक माध्यम के रूप में इस्तेमाल हो।

इससे छोटे बच्चों में लिखने और कक्षा में लंबे समय तक ध्यान लगाने जैसी बुनियादी क्षमताओं पर दोबारा जोर दिया जा रहा है। शिक्षकों का अनुभव है कि स्क्रीन पर लगातार निर्भर रहने के बजाय लिखने और प्रत्यक्ष बातचीत वाली गतिविधियों से बच्चों को कक्षा में सक्रिय बनाए रखना आसान हो सकता है।

30 मिनट

प्राथमिक कक्षाएं

प्राथमिक छात्रों के लिए प्रतिदिन डिजिटल स्क्रीन इस्तेमाल की अधिकतम सीमा।

60 मिनट

अपर-प्राइमरी

अपर-प्राइमरी छात्रों के लिए प्रतिदिन स्क्रीन इस्तेमाल की अधिकतम सीमा।

पढ़ाई पर स्क्रीन टाइम का असर क्यों चर्चा में आया?

डिजिटल तकनीक ने स्कूलों में पढ़ाने के तरीके को काफी बदला है। एनिमेशन, वीडियो, डिजिटल मैप, इंटरैक्टिव प्रश्न और अन्य सामग्री कठिन विषयों को समझाने में उपयोगी हो सकती है। लेकिन समस्या तब सामने आती है जब स्क्रीन शिक्षण का सहायक साधन होने के बजाय पूरी कक्षा का मुख्य माध्यम बन जाती है।

प्रशासन को मिली शिकायतों में बच्चों की आंखों में तनाव, सूखापन, सिरदर्द और एकाग्रता में कमी जैसी चिंताओं का उल्लेख किया गया। इसी वजह से स्क्रीन का समय सीमित करने के साथ डिजिटल इस्तेमाल के बीच ब्रेक देने पर भी जोर दिया गया है।

Greater Noida में किए गए एक 2024 के शोध में भी स्कूल जाने वाले बच्चों के स्क्रीन टाइम और academic performance, anxiety तथा behavioural problems के बीच संबंध का अध्ययन किया गया था। हालांकि ऐसे अध्ययनों के निष्कर्षों को किसी एक बच्चे पर सीधे लागू नहीं किया जा सकता, लेकिन यह विषय स्कूलों में संतुलित डिजिटल उपयोग की जरूरत को समझने में मदद करता है।

बच्चों की आंखों और एकाग्रता पर भी नजर

नई व्यवस्था में बच्चों की आंखों के स्वास्थ्य को लेकर भी सावधानी बरतने पर जोर दिया गया है। रिपोर्टों के अनुसार डिजिटल स्क्रीन के इस्तेमाल के दौरान नियमित ब्रेक देने और बच्चों की आंखों की समय-समय पर जांच कराने की व्यवस्था पर भी जोर दिया गया है।

स्क्रीन टाइम कम करने का उद्देश्य केवल आंखों पर पड़ने वाले तनाव को कम करना नहीं है। बच्चों को लिखने, पढ़ने, बातचीत करने, खेल और रचनात्मक गतिविधियों के लिए अधिक समय देना भी इस नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

20 मिनट बाद ब्रेक की व्यवस्था

स्कूलों को लंबे समय तक लगातार स्क्रीन देखने से बचाने के लिए बीच-बीच में ब्रेक देने के निर्देश दिए गए हैं। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार लगभग 20 मिनट के डिजिटल स्क्रीन इस्तेमाल के बाद बच्चों को स्क्रीन से नजर हटाकर आराम देने पर जोर दिया गया है।

इस व्यवस्था का मकसद यह है कि यदि किसी विषय को डिजिटल माध्यम से पढ़ाना जरूरी हो तो भी बच्चे लगातार स्क्रीन पर नजर टिकाकर न बैठे रहें। शिक्षक स्क्रीन के साथ-साथ बोर्ड, किताब और मौखिक व्याख्या का भी इस्तेमाल कर सकते हैं।

डिजिटल-फ्री पीरियड और डिजिटल जीरो डे

स्कूलों को जरूरत के अनुसार डिजिटल-फ्री पीरियड, डिजिटल जीरो डे और डिजिटल डिटॉक्स जैसी गतिविधियां शुरू करने के लिए भी प्रोत्साहित किया गया है। इनका उद्देश्य बच्चों को कुछ समय के लिए पूरी तरह स्क्रीन से दूर रखकर अन्य शैक्षणिक और रचनात्मक गतिविधियों में शामिल करना है।

ऐसे पीरियड में किताब पढ़ना, हस्तलेखन, कला, खेल, समूह गतिविधियां, प्रोजेक्ट वर्क और शिक्षक के साथ प्रत्यक्ष चर्चा जैसे विकल्प अपनाए जा सकते हैं। इससे बच्चों की पढ़ाई में डिजिटल और गैर-डिजिटल माध्यम के बीच संतुलन बनाया जा सकता है।

शिक्षकों के लिए भी बदला पढ़ाने का तरीका

स्मार्ट क्लास के बढ़ते इस्तेमाल ने शिक्षकों के पढ़ाने के तरीके को भी बदल दिया था। कई शिक्षक डिजिटल बोर्ड पर पहले से तैयार सामग्री, वीडियो और प्रश्नों का इस्तेमाल कर रहे थे। अब स्क्रीन टाइम की सीमा के बाद उन्हें पाठ को अलग-अलग माध्यमों में बांटकर पढ़ाना होगा।

किसी कठिन अवधारणा को समझाने के लिए स्मार्ट टीवी या डिजिटल बोर्ड का इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन इसके बाद उसी विषय पर कॉपी में अभ्यास, बोर्ड पर लिखना, मौखिक सवाल-जवाब या समूह चर्चा कराई जा सकती है।

इससे शिक्षक की प्रत्यक्ष भूमिका दोबारा महत्वपूर्ण हो जाती है। बच्चों की गलतियां पहचानना, उनके सवाल समझना और उनकी सीखने की गति के अनुसार पढ़ाना केवल डिजिटल स्क्रीन से संभव नहीं है।

कोविड के बाद बढ़ी डिजिटल निर्भरता पर भी सवाल

कोविड-19 महामारी के दौरान ऑनलाइन कक्षाओं के कारण स्कूलों में डिजिटल शिक्षा का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा था। स्कूल दोबारा खुलने के बाद भी कई डिजिटल प्रक्रियाएं पूरी तरह खत्म नहीं हुईं। स्मार्ट बोर्ड, ऑनलाइन होमवर्क, मैसेजिंग ग्रुप, LMS और ERP जैसी प्रणालियां शिक्षा व्यवस्था का हिस्सा बनी रहीं।

नोएडा और ग्रेटर नोएडा के कुछ स्कूलों में भी डिजिटल माध्यम का इस्तेमाल बढ़ता गया। हालिया रिपोर्टों में शिक्षकों और अभिभावकों ने बताया कि लगातार स्क्रीन आधारित पढ़ाई के कारण कुछ बच्चों में ध्यान केंद्रित करने, लिखने और स्क्रीन से दूर रहने में कठिनाई दिखाई दी।

प्रशासन की नई सीमा इसी डिजिटल निर्भरता को संतुलित करने की कोशिश के रूप में देखी जा रही है। इसका उद्देश्य तकनीक को हटाना नहीं बल्कि यह तय करना है कि बच्चों की शिक्षा में तकनीक का इस्तेमाल कब और कितना किया जाए।

छात्रों की पढ़ाई पर क्या असर पड़ेगा?

स्क्रीन टाइम घटाने के बाद छात्रों की पढ़ाई पर तत्काल सकारात्मक या नकारात्मक असर का अंतिम निष्कर्ष अभी निकालना जल्दबाजी होगा। प्रशासन और स्कूलों के सामने अब यह देखने की चुनौती है कि सीमित डिजिटल समय के साथ बच्चों की सीखने की क्षमता, परीक्षा प्रदर्शन, ध्यान और कक्षा में भागीदारी में क्या बदलाव आता है।

यदि शिक्षक डिजिटल सामग्री का इस्तेमाल केवल कठिन अवधारणाओं को समझाने के लिए करते हैं और बाकी समय किताब, लेखन, चर्चा तथा गतिविधियों को देते हैं तो पढ़ाई अधिक संतुलित हो सकती है। दूसरी ओर, डिजिटल सामग्री पर अत्यधिक निर्भर विषयों के लिए वैकल्पिक शिक्षण सामग्री तैयार करना भी जरूरी होगा।

इसलिए आने वाले महीनों में स्कूलों द्वारा छात्रों की academic performance, classroom participation और learning outcomes की समीक्षा महत्वपूर्ण होगी। यही समीक्षा बताएगी कि स्क्रीन टाइम की सीमा को भविष्य में किस तरह बेहतर बनाया जा सकता है।

अभिभावकों की भूमिका भी महत्वपूर्ण

स्कूल में स्क्रीन टाइम सीमित करने के बाद घर पर बच्चों के डिजिटल इस्तेमाल पर ध्यान देना भी जरूरी है। यदि बच्चा स्कूल में स्क्रीन का कम इस्तेमाल करता है लेकिन घर पर कई घंटे मोबाइल, टीवी, गेम या वीडियो पर बिताता है तो कुल दैनिक स्क्रीन एक्सपोजर फिर भी अधिक रह सकता है।

अभिभावक बच्चों के लिए स्क्रीन-मुक्त समय निर्धारित कर सकते हैं। किताब पढ़ना, बाहर खेलना, परिवार के साथ बातचीत, कला और अन्य रचनात्मक गतिविधियों को रोजमर्रा की दिनचर्या में शामिल करना बच्चों के लिए संतुलित वातावरण बनाने में मदद कर सकता है।

स्कूल और अभिभावकों के बीच संवाद भी महत्वपूर्ण है। बच्चों के व्यवहार, एकाग्रता या पढ़ाई में किसी बदलाव की स्थिति में शिक्षक और अभिभावक मिलकर कारणों को समझ सकते हैं।

स्कूलों में निगरानी और अनुपालन

प्रशासन ने स्कूलों को जारी निर्देशों के पालन की निगरानी के लिए नामित मजिस्ट्रेट और नोडल अधिकारियों की व्यवस्था की है। इसका उद्देश्य यह देखना है कि स्कूल निर्धारित स्क्रीन टाइम सीमा का पालन कर रहे हैं या नहीं।

केवल स्क्रीन बंद कर देना इस व्यवस्था का उद्देश्य नहीं है। स्कूलों को डिजिटल तकनीक का उपयोग जरूरत के अनुसार करने और साथ ही पारंपरिक तथा गतिविधि आधारित शिक्षण को बढ़ावा देने की दिशा में काम करना होगा।

डिजिटल शिक्षा की गुणवत्ता इस बात पर निर्भर करती है कि तकनीक का इस्तेमाल सीखने को बेहतर बनाने के लिए किया जा रहा है या केवल किताब की सामग्री को स्क्रीन पर दिखाने के लिए। प्रशासन की नई व्यवस्था इसी अंतर को स्पष्ट करने की कोशिश करती है।

मुख्य बातें एक नजर में

क्षेत्र

नोएडा और ग्रेटर नोएडा

प्राथमिक स्क्रीन सीमा

30 मिनट प्रतिदिन

अपर-प्राइमरी स्क्रीन सीमा

60 मिनट प्रतिदिन

मुख्य उद्देश्य

संतुलित डिजिटल शिक्षा

ब्रेक

लगातार स्क्रीन से बचाव

वैकल्पिक शिक्षण

किताब, बोर्ड, लेखन और गतिविधियां

निष्कर्ष

नोएडा और ग्रेटर नोएडा के स्कूलों में स्मार्ट टीवी और डिजिटल स्क्रीन का स्क्रीन टाइम सीमित करने का फैसला बच्चों की पढ़ाई में तकनीक और पारंपरिक शिक्षण के बीच संतुलन बनाने की कोशिश है। प्राथमिक छात्रों के लिए 30 मिनट और अपर-प्राइमरी के लिए 60 मिनट की सीमा के साथ स्कूलों को किताब, लेखन, बोर्ड, खेल और प्रत्यक्ष संवाद जैसी गतिविधियों के लिए अधिक समय देने पर जोर है। अब आगे छात्रों के learning outcomes, classroom participation और स्वास्थ्य से जुड़े संकेतकों की समीक्षा महत्वपूर्ण होगी, जिससे यह पता चलेगा कि नई व्यवस्था किस तरह काम कर रही है।